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Friday, 26 October 2018

महेडू चाखा का परीचय

      महेडू चाखा का परीचय

) मेहडू / जाड़ावत महकरण मेहडू ( जड्डा चारण ) महडू शाखा का नामकरण मेड़वा गांव पर प्रसिद्ध हुआ माना जाता है ।महडू केसरिया , महियारीया सहित बारह शाखाओं का विवरण मिलता है ।इस शाखा के गांव सरस्या , बाड़ी , देवरी , खेरी , संचयी , सालीया एवं कोकलगढ़ है ।मेहडू शाखा में कविवर महकरणजी , कानदासजी , लांगीदानजी , वजमालजी जैसे कवि हुए ।इनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली एवं काव्य प्रतिभा से यश कीर्ति महकरण मेहडू को प्राप्त हुई ।ये मूलतः सरस्या ( तह जहाजपुर , भीलवाड़ा ) के रहने वाले थे ।इनकी काव्य प्रतिभा पर अकबर बादशाह भी मुग्ध थे ।शरीर से भारी होने पर ये जाड़ा चारण नाम से विख्यात हुए ।तथा इनके वंशज जाड़ावत / मेहडू कहलाने लगे ।अकबर बादशाह के दरबार में प्रथम भेंट में ही इन्होंने अपने भारी शरीर होने से उठ कर नजराना करने के ।विषय में अपनी असमर्थता प्रकट कर दी ।इस पर इनको बैठे बैठे ताजीम देने का अधिकार दिया गया ।अकबर के नवरत्नों में से एक वजीर खानखाना मिर्जा अब्दुल रहीम ने इनकी विद्वता पर मुग्ध होकर ये दोहा कहा : धर जड्डा अंबर जड़ा जड्डा चारण जोय ।जड़ा नाम अल्लाहरां अवर नं जड़ा कोय ।।महियारिया कविवर श्री नाथूसिंह महियारिया महियारिया गौत्र का नाम महाराणा द्वारा महियार गांव जागीर में देने पर उक्त गांव के नाम से महियारिया हुआ ।इनके पूर्वज

Sunday, 21 October 2018

चाचडा चाखा का परीचय

चाचडा चाखा का परीचय

चाचडा शाखा की उद्गम मूल शाखा चडवा है , जिसके अन्तर्गत चउफवा , झुला , बझड़ा आदि गोत्र आती है यद्यपि इसके बारे में ज्यादा ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती है , फिर भी यह अनेक गोत्रों का समुदाय रहा है । इस गोत्र के बारे में गुजराती में एक गीत लिखा मिलता है जिसमें इनकी अन्य ‘ भाईपा ' गोत्र का वर्णन मिलता है काजा , चउवा आलग्ग भ्रारी , लागंडीआ , कुंवारिया मूजड़ा छाछडा भाम , धनीया , भातंग अरड सूभग झुला जणीया , वीझंवा ओक , सुपार खरे , गावो ऐसी हरि नरसिंह वागीया , धाया , नाया , राजवला वरसड़ा गांगडीया चाटका राजा खोड खुलडीया देथा | जुगतीदान देथा ( सन् 1855 - 1936 ई . ) .

आढा चाखा का परीचय

आढा चाखा का परीचय

  •   veer Gadhavi       आढा चाखा का परीसय                                           
    आढ़ा चारणों की बीस मूल शाखाओं ( बीसोतर ) में " वाचा " शाखा में सांदु , महिया तथा " आढ़ा " सहित सत्रह प्रशाखाएं हैं । इसके अन्तर्गत ही आढ़ा गौत्र मानी जाती है । आढ़ा नामक गांव के नाम पर उक्त शाखा का नाम पड़ा जो कालान्तर में आढ़ा गौत्र में । परिवर्तित हो गया । चारण समाज में महान ख्यातनाम कवियों में दुरसाजी आढा का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है । इनका जन्म 1535 ईस्वी में आढ़ा ( असाड़ा ) ग्राम जसोल मलानी ( बाड़मेर ) में हुआ । इनके पिता मेहाजी आढ़ा तथा दादा अमराजी आढ़ा थे । ये अपनी वीरता , योग्यता एवं कवित्व शक्ति के रूप में राजस्थान में विख्यात हुए । इन्हें पेशुआ , झांखर , उफंड और साल नामक गांव एवं 1 करोड़ पसाव ( 1607 ई . ) राज सुरताणसिंह सिरोही द्वारा प्रदान किये गये । राजस्थान में राष्ट्र जननी का अभिनव संदेश घर - घर पहुंचाने के लिए ये पूरे राजपूताना में घूमें । वीर भूमि मेवाड़ में पधारने पर महाराणा अमरसिंह ने इनका बड़ी पोल तक भव्य स्वागत किया था । इन्हीं के वंशजों में जवान जी आढा को ही मेवाड़ में जागीर गांव मिले । इतिहास विशेषज्ञ डॉ . मेनारिया के अनुसार दुरसाजी ने अपनी काव्य प्रतिभा से जितना यष , प्रतिष्ठा और धन अर्जित किया उतना किसी अन्य कवि ने नहीं प्राप्त किया । अचलगढ़ ( माउन्ट आबू ) देवालय में इनकी पीतल की मूर्ति स्थापित है जिस पर ( 1628 ई . ) का एक लेख उत्तीर्ण है । संभवतः किसी कवि की पीतल की मूर्ति का निर्माण पूर्व में कहीं देखने को नहीं मिलता है । इनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में विरूद्ध छहतरी , किरतार । बावनी एवं श्रीकुमार अज्जाजी नी भूचर मौरी नी गजजत मुख्य

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